फेमस अभिनेता govardhan asrani, जिन्हें सभी प्यार से असरानी के नाम से जानते थे, का सोमवार 20 अक्टूबर को मुंबई में लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया। वे 84 वर्ष के थे।
गोवर्धन असरानी (असरानी) अपनी बेमिसाल एक्टिंग और चेहरे के भावों से साधारण किरदारों में भी खास जादू भर दिया करते थे । उनकी प्रतिभा सिर्फ हँसी तक सीमित नहीं थी — वे हर भूमिका में मानवीय भावनाओं को और गहराई को जोड़ते थे। उन्होंने सहायक किरदारों की छवि तोड़ी और मुख्य भूमिकाओं में हास्य व नाटकीयता का सुंदर मेल दिखाया। राजेश खन्ना, अमिताभ बच्चन, और जीतेंद्र जैसे सितारों के साथ उनके किरदारों ने 1970-80 के दशक के सिनेमा को और जीवंत बनाया।
शुरुआती जीवन और अभिनय की शुरुआत
1 जनवरी 1941 को जयपुर के एक सिंधी परिवार में जन्मे असरानी का मन अपने पिता के कालीन व्यवसाय में नहीं लगता था। उनका बचपन से ही मंच पर आने, और मंच पर आकर अभिनय के द्वारा लोगों को हंसाने का सपना था। उन्होंने अपना सफर आकाशवाणी से शुरू किया और बाद में भारतीय फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान (FTII) में दाखिला लिया। यहाँ उन्होंने रोशन तनेजा और ऋषिकेश मुखर्जी जैसे महान गुरुओं से अभिनय की गहराई सीखी ।
हास्य के सरताज: 400 से अधिक फिल्मों का सफर
जॉनी वॉकर, गोप और आगा की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए असरानी ने महमूद के दौर में अपनी अलग पहचान बनाई। उन्होंने 400 से ज़्यादा फिल्मों में काम किया और भारतीय सिनेमा के सबसे प्रिय हास्य कलाकारों में शामिल हुए।
शोले का जेलर और यादगार किरदार
असरानी का सबसे यादगार किरदार रहा ‘शोले’ का जेलर, जो एडॉल्फ हिटलर की नकल करता हुआ एक अनाड़ी लेकिन मज़ेदार पात्र है। उनका खास लहजा और चेहरे के भाव आज भी भारतीय पॉप कल्चर का हिस्सा हैं।
असरानी सिर्फ कॉमेडी तक सीमित नहीं थे — गुलज़ार और ऋषिकेश मुखर्जी की फिल्मों में उन्होंने संवेदनशील और भावनात्मक भूमिकाएँ भी निभाईं।
आम आदमी के किरदारों में जान
‘नमक हराम’ में धोंडूदास, ‘बावर्ची’ में बब्बू, ‘गुड्डी’ में दुखांत पात्र, और ‘अभिमान’ में मैनेजर, हर फिल्म में असरानी ने अपने किरदारों में सादगी और सच्चाई भरी।
वे अक्सर सामाजिक संदेशों को हास्य के साथ जोड़ते थे, जिससे दर्शक मुस्कुराने के साथ सोचने पर भी मजबूर हो जाते थे।
अभिनेता से निर्देशक तक का सफर
जब असरानी को सहायक भूमिकाओं में बाँधने की कोशिश हुई, तो उन्होंने खुद को नए रूप में प्रस्तुत किया। फिल्म ‘आरोप’ में उनके अभिनय को खूब सराहा गया।
इसके बाद उन्होंने निर्देशन की बागडोर संभाली — ‘चला मुरारी हीरो बनने’ जैसी आत्मकथात्मक फिल्म बनाई, जो एक संघर्षरत अभिनेता की कहानी थी। उन्होंने ‘हम नहीं सुधरेंगे’, ‘दिल ही तो है’, और ‘उड़ान’ जैसी फिल्मों से भी निर्देशन में अपनी पहचान बनाई।
गुजराती सिनेमा और थियेटर से जुड़ाव
असरानी ने गुजराती सिनेमा में भी अपनी छाप छोड़ी।
‘अमदावाद नो रिक्शावालो’, ‘सात कैदी’, ‘संसार चक्र’, और ‘मोटा घर नी वहू’ जैसी फिल्मों में वे मुख्य भूमिका में नजर आए। इसके साथ ही वे मंच (थियेटर) से भी जुड़े रहे और अभिनय की जड़ों को हमेशा जीवित रखा।
नयी पीढ़ी में भी वही चमक
समय के साथ असरानी ने खुद को हर दौर में ढाल लिया। 1980 और 1990 के दशक की सामाजिक कॉमेडी फिल्मों से लेकर 2000 के दशक की पारिवारिक फिल्मों तक, वे हमेशा दर्शकों के प्रिय बने रहे। ‘बागबान’, ‘ड्रीम गर्ल 2’, और वेब सीरीज़ ‘द ट्रायल’ में उनकी उपस्थिति ने यह साबित किया कि असली कलाकार कभी पुराने नहीं होते।
एक सदी का कलाकार
असरानी सिर्फ एक हास्य कलाकार नहीं, बल्कि भारतीय सिनेमा का वह चेहरा हैं जिसने पाँच दशकों तक दर्शकों को हँसी और भावना का सुंदर संगम दिया।
उनकी यात्रा सिखाती है — सच्चा कलाकार वही है जो हर दौर में नया रंग भर दे।
असरानी ने यह बात अपने जीवन और कला दोनों से सिद्ध की है।